सौरव गांगुली के जीवन के उस काले अध्याय से लेकर इस आखिरी लम्हे तक की कहानी…

By | 08/07/2020

सौरव गांगुली भारतीय क्रिकेट का ऐसा नाम जिसने 1983 की उपलब्धी के बाद गुमनाम हो रही टीम को संभाला और विदेशी सरजमीं पर जीतना सिखाया। दादा कहे जाने वाले गांगुली का आज जन्मदिन है। इस अवसर पर आज हम आपको बताएंगे कि बीसीसीआई के वर्तमान अध्यक्ष की जिंदगी के एक काले अध्याय से रूबरू करवाएंगे। आपको बताएंगे कि गांगुली ने अपनी ज़िंदगी में एक ही गलती की….उन्होंने एक ऐसे शख्स की दिल खोलकर मदद की जिसने सौरव को ही डस लिया।

आप गलत सोच रहे हैं आज हम भारत के सबसे बहादुर कप्तान सौरव गांगुली और कोच ग्रेग चैपल के बीच तकरार की बात नहीं करेंगे। हम नहीं बताएंगे कि उनके बीच क्यों तकरार हुई,रंजिश हुई,बात बतंगड़ बनी। ना ना ऐसा कुछ नहीं हम कहेंगे, बल्कि हम सौरव की उस कहानी की परतों को पलटेंगे जिसकी वजह से दुनिया सौरव को दादा कहकर सज़दा करती है। हम उन अंधेरी गलियों से गुज़रेंगे जहां गांगुली को झोंक दिया गया था, लेकिन वे लड़े…उठे और दिखा दिया कि दर्द के आगे उनमें एक चैंपियन बसता है।

हम आपको बताएंगे उसी कप्तान की कहानी, जिसका क्रिकेट करियर समुंदर की लहरों की तरह उतार-चढ़ाव से भरा रहा, लेकिऩ फिर भी उस खिलाड़ी ने हार नहीं मानी और फाइटबैक करते हुए वापसी के बाद अपने इंटरनेशनल करियर के आखिरी पलों में भी दुनिया के सामने हाथ उठाकर खेल को अलविदा कहा।

सौरव गांगुली के जीवन का काला अध्याय !

ये सब जानते हैं कि सौरव गांगुली ने विदेशी सरजमीं पर टीम को लड़ना सिखाया, युवाओं से भरी टीम को जीतना सिखाया, नैटवेस्ट ट्रॉफी का चैंपियन बनाया और वर्ल्ड कप 2003 के फाइनल तक पहुंचाया। लेकिन 2005 में और उसके बाद के 2 सालों में दादा के साथ जो हुआ…हम वो बताएंगे।

साल 2005 में लगा कि गांगुली का करियर खत्म हो गया है। लेकिन दादा ने जिस तरह से वापसी की उन्होंने दिखा दिया था, कि क्यों उन्हें टाईगर कहा जाता है। वो दिन गांगुली के लिए बुरे थे, फॉर्म उनका साथ नहीं दे रहा था । फिर कप्तान के रूप में जिस टीम इंडिया को उन्होंने बनाया, उसी टीम से गांगुली को बाहर कर दिया गया। पूरे क्रिकेट जगत में हाहाकार मच गया था, बीसीसीआई हेडक्वार्टर से लेकर भारतीय संसद , हर जगह सौरव गांगुली को बाहर करने की चर्चा और विरोध था। लेकिन ये टाईगर रुका नहीं, जिद और जुनून के प्रतीक सौरव गांगुली ने टीम में ज़ोरदार वापसी की।

गांगुली ने कैसे खुद को संभाला ?

सौरव गांगुली हमेशा से ही कभी हार न मानने वाले व्यक्ति रहे हैं। जिस वक्त 2005 में उन्हें टीम से ड्रॉप किया गया, उसके तुरंत बाद नवंबर में दलीप ट्राफी के एक मैच में गांगुली ने शतक लगाकर बता दिया था कि अभी उनका वक्त खत्म नहीं हुआ है। लेकिन टीम मैनेजमेंट गांगुली के शायद हाथ धोकर पीछे पड़ा था, 22 नवंबर 2005 को पांच साल भारतीय टेस्ट टीम की कप्तानी के सुनहरे दौर के बाद गांगुली से कप्तानी छीनकर राहुल द्रविड़ को सौंप दी गई। गांगुली भी कहां अपने रौब से पीछे हटने वाले थे एक घंटे के अंदर उन्होंने खुद ही बंगाल रणजी टीम की कप्तानी से इस्तीफा दे दिया। उसके बाद पाकिस्तान सीरीज में गांगुली को कभी अंदर कभी बाहर किया जाने लगा, मानो चैपल उनसे किसी चीज की दुश्मनी निकाल रहे हों। दादा कभी झुकने और कभी हारने वाला नहीं थे और आखिरकार गांगुली ने टीम में वापसी की और सबको दिखा दिया कि अगर हौसला बुलंद हो तो मुश्किल से मुश्किल दौर से भी निकला जा सकता है।

15 दिसंबर 2006 को दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ जोहानिसबर्ग में भारत के चार विकेट गिरने के बाद मैदान पर एक बार फिर गूंजे दादा…दादा के शोर ने सबको बता दिया था कि टाइगर इज बैक। भारत के 37 रनों पर चार विकेट गिरने के बाद गांगुली ने मुश्किल कंडीशन में टीम को संभाला भी और मुश्किल से निकाला भी। इस पारी के बाद गांगुली ने पूरी दुनिया को दिखा दिया था कि शेर कभी शिकार करना नहीं भूलता है। इसके बाद श्रीलंका के खिलाफ सीरीज में भी गांगुली को मैन ऑफ द सीरीज पुरस्कार से नवाजा गया। एक बार फिर से दादा ने मैदान पर अपना जलवा बना लिया था, और 2007 में टेस्ट और वनडे दोनों ही फॉर्मेट में 1000 से ज्यादा का आंकड़ा पार किया था। अच्छे प्रदर्शन के बावजूद गांगुली को बार-बार टीम से अंदर बाहर किया जाने लगा।

विश्व कप 2007 में गांगुली का प्रदर्शन !

वर्ल्ड कप 2007 शुरु हुआ और सौरव गांगुली को भी टीम में जगह मिली> भारतीय टीम अपना पहला मुकाबला बांग्लादेश से हार गई लेकिन गांगुली ने सर्वाधिक 51 रनों की अर्द्धशतकीय पारी खेली , उसके बाद बरमूडा के खिलाफ भी दादा ने 87 रन बनाए। इसके बाद श्रीलंका से हार कर भारतीय टीम बाहर हो गई । वर्ल्ड कप के तुरंत बाद चैपल का विरोध इतना ज्यादा बढ़ गया कि उनकी भारत से ही छुट्टी हो गई और द्रविड़ ने भी कप्तानी से इस्तीफा दे दिया। फिर यहीं से शुरु हुआ धोनी युग जहां से युवा क्रिकेटर्स को टीम में ज्यादा तवज्जो मिलने लगी और अब समय आ गया था जब गांगुली को एहसास हो गया कि ये उनका क्रिकेट को अलविदा कहने का सही समय है ।

गांगुली के करियर का आखिरी लम्हा !

10 नवंबर 2008 का वो दिन, भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच खेली जा रही टेस्ट सीरीज के चौथे टेस्ट का वो आखिरी मंजर, जब क्रिकेट का महाराजा भारतीय टीम की कप्तानी कर रहा था। ये वो लम्हा था जब भारत जीत की दहलीज पर था और क्रिकेट की दुनिया का एक सूर्य अस्त होने वाला था। नागपुर के स्टेडियम में हर तरफ गूंज थी, दादा..दादा के नारों की। धोनी ने ऑस्ट्रेलिया के नौ विकेट गिरने के बाद भारतीय क्रिकेट के नायकों में से एक सौरव गांगुली को एक बार फिर कप्तानी सौंप कर सबका दिल जीत लिया था। लेकिन उसके बाद दोबारा दादा भारतीय टीम के लिए खेलते नहीं दिखे क्योंकि ये उनका आखिरी मैच था और उन्होंने इंटरनेशनल क्रिकेट को अलविदा कहने का फैसला कर लिया था।

इसके बाद आईपीएल में भी दादा ने अपनी दादागिरी नहीं छोड़ी और केकेआर की टीम से बाहर होने के बाद पुणे की तरफ से खेलते हुए दिखा दिया, कि वह जो भी करते हैं शान से करते हैं ।

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